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अभिव्यक्ति की आजादी और न्यायलय की अवमानना

प्रशांत भूषण को 31 तारीख को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना मामले में दोषी करार दिया गया! 3 सदस्य न्यायालय पीठ ने जिसमें जस्टिस अरुण मिश्रा जस्टिस वीआर गवाई जस्टिस कृष्ण मुरारी शामिल थे ने प्रशांत भूषण को अदालत ने कोर्ट का अवमानना का दोषी पाया तथा उन्हें सज़ा एक रुपए की धन राशि की सजा दी गई अगर यह रकम 15 सितंबर तक प्रशांत भूषण द्वारा नहीं चुकाया जाता है! उनको 3 माह का कारावास तथा 3 साल तक के लिए वकालत से प्रतिबंधित कर दिया जाएगा क्या था मामला- प्रशांत भूषण ने दो ट्वीट किए थे पहला ट्वीट 31 जून 2020 वह दूसरा टूट 19 जून 2020 को किया था जिसमें उन्होंने एक तस्वीर पोस्ट करते हुए चीफ जस्टिस CGI पर टिप्पणी की थी और चार पूर्व जजों पर भी भस्टाचार का आरोप लगाया था ! इस पर 9 जुलाई महक महेश्वरी सुप्रीम कोर्ट में अदालत की अवमानना का रीट लगाया था भूषण की मुश्किलें तब बड़ी जब कोर्ट ने 21 जुलाई को ट्वीट पर स्वत संज्ञान ले लिया भूषण को अवमानना का दोषी पाया गया व उनको न्यायलय अवमानना अधिनियम 19971 के तहत सज़ा दिया गया न्यायलय अवमानना अधिनियम 19971 क्या है - न्यायालय का अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Court Act, 1971) के अनुसार, न्यायालय की अवमानना का अर्थ किसी न्यायालय की गरिमा तथा उसके अधिकारों के प्रति अनादर प्रदर्शित करना है। इस अधिनियम में अवमानना को ‘सिविल अवमानना और ‘आपराधिक अवमानना में बाँटा गया है। "सिविल अवमानना मे कहा गया हैं की न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री, आदेश, रिट, अथवा अन्य किसी प्रक्रिया की जान बूझकर की गई अवज्ञा या उल्लंघन करना न्यायालय की सिविल अवमानना कहलाता है"। आपराधिक अवमानना मे कहा गया की "न्यायालय की आपराधिक अवमानना का अर्थ न्यायालय से जुड़ी किसी ऐसी बात के प्रकाशन से है, जो लिखित, मौखिक, चिह्नित , चित्रित या किसी अन्य तरीके से न्यायालय की अवमानना करती हो।" हालाँकि किसी मामले का निर्दोष प्रकाशन, न्यायिक कृत्यों की निष्पक्ष और उचित आलोचना तथा न्यायालय के प्रशासनिक पक्ष पर टिप्पणी करना न्यायालय की अवमानना के अंतर्गत नहीं आता है। न्यायालय की अवमानना के लिये दंड का प्रावधान यह हैं सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय को अदालत की अवमानना के लिये दंडित करने की शक्ति प्राप्त है। यह दंड छह महीने का साधारण कारावास या 2000 रूपए तक का जुर्माना या दोंनों एक साथ हो सकता है। वर्ष 1991 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि उसके पास न केवल खुद की बल्कि पूरे देश में उच्च न्यायालयों, अधीनस्थ न्यायालयों तथा न्यायाधिकरणों की अवमानना के मामले में भी दंडित करने की शक्ति है। उच्च न्यायालयों को न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 10 के अंतर्गत अधीनस्थ न्यायालयों की अवमानना के लिये दंडित करने का विशेष अधिकार प्रदान किया गया है। अवमानना अधिनियम की आवश्यकता न्यायालय का अवमानना अधिनियम, 1971 का उद्देश्य न्यायालय की गरिमा और महत्त्व को बनाए रखना है। अवमानना से जुड़ी हुई शक्तियाँ न्यायाधीशों को भय, पक्षपात और की भावना के बिना कर्त्तव्यों का निर्वहन करने में सहायता करती हैं। संवैधानिक रूप से देखा जाए तो अनुच्छेद 129 सर्वोच्च न्यायालय को स्वंय की अवमानना के लिये दंडित करने की शक्ति देता है। वही अनुच्छेद 142 (2)यह अनुच्छेद अवमानना के आरोप में किसी भी व्यक्ति की जाँच तथा उसे दंडित करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय को सक्षम बनाता है। अनुच्छेद 215 उच्च न्यायालयों को स्वंय की अवमानना के लिये दंडित करने में सक्षम बनाता है। अवमानना से जुड़े अन्य मामले संविधान का अनुच्छेद-19 भारत के प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति एवं भाषण की स्वतंत्रता प्रदान करता है परंतु न्यायालय का अवमानना अधिनियम, 1971 द्वारा न्यायालय की कार्यप्रणाली के खिलाफ बात करने पर अंकुश लगा दिया है। कानून बहुत व्यक्तिपरक है, अतः अवमानना के दंड का उपयोग न्यायालय द्वारा अपनी आलोचना करने वाले व्यक्ति की आवाज़ को दबाने के लिये किया जा सकता है। न्यायालय का अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Court Act, 1971): यह अधिनियम अवमानना के लिये दंडित करने तथा न्यायालयों की प्रक्रिया को नियंत्रित करने की शक्ति को परिभाषित करता है। इस कानून में वर्ष 2006 में धारा 13 के तहत ‘सत्य की रक्षा’ (Defence of Truth) को शामिल करने के लिये संशोधित किया गया था। क्यो मिली भूषण को सजा मे छुट - भारत के महान्यायवादी केके वेणुगोपाल ने प्रशांत भूषण के पिछले कई रिट को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया था कि भूषण को सजा में छुट दिया जाए अब फैसला भी आ गया है और यह आगे के फैसलों के लिए ऐतिहासिक भी रहे गा की आप अभिव्यक्ति की आजादी पर कहा तक कोर्ट के कार्य शैली पर टिप्पणी कर सकते हैं!

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